राजधानी में काली पूजा को लेकर बंगाली समाज की तैयारी, जानेऐ महत्व

रांची। सोमवर को पूरे देश दिवाली मनाई जाएगी. कार्तिक अमावस्या लोग दीपावली मनाते हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, असम, झारखंड के इलाकों में इस दिन को मां काली की पूजा धूमधाम से की जाती है. बंगाली परंपरा में दीपावली को काली पूजा ही कह कर संबोधित भी किया जाता है. दीपावली की मध्यरात्रि को लोग मां काली की आराधना करते हैं. राजधानी के विभिन्न मंदिरों में काली पूजा की तैयारी जोर शोर से की जा रही है.राजधानी के प्रसिद्ध मंदिर मेन रोड स्थित काली मंदिर के पुजारी बताते हैं कि सनातन धर्म में काली पूजा की बहुत ही महत्व है. खासकर कर इस मंदिर में काली पूजा के दिन राजधानी के सभी इलाकों से लोग इस मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं. हिंदू धर्म में मान्यता के अनुसार काली पूजा के दिन ही मां काली 64 हजार योगिनियों के साथ प्रकट हुई थीं. उन्होंने रक्तबीज सहित कई असुरों का संहार किया था. इसलिए बंगाली समुदाय के लोग इस पूजा को शक्ति पूजा के रूप में भी मानते हैं. ऐसा माना जाता है कि आधी रात को मां काली की विधिवत पूजा करने पर मनुष्य के जीवन के संकट, दुख और पीड़ा समाप्त हो जाती हैं. शत्रुओं का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आने लगती है. इस वर्ष काली माता के मंदिरों में 24 अक्टूबर की रात को काली पूजा की जाएगी जो सुबह 3 बजे तक चलेगी.

कॉसमॉस क्लब काली पूजा समिति के वरिष्ठ सदस्य देवाशीष रॉय कहते हैं कि बंगाली समुदाय में काली पूजा का एक विशेष महत्व है.

लालपुर स्थित कॉसमॉस पूजा समिति में ज्यादातर बंगाली समाज के लोग अपना योगदान देते हैं. इस वर्ष भी बंगाली समाज की तरफ से पंडाल बनाया गया है. कोरोना काल के बाद लोगों को मौका मिला है कि वो खुलकर काली पूजा मना सकें. इसीलिए इस वर्ष का काली पूजा के मौके पर बंगाली समाज की तरफ से विभिन्न तरह के कार्यक्रम भी कराए जा रहे हैं. जिसमें कोलकाता से कलाकार को भी बुलाया जाएंगे.

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