जंगलों में हर साल लगने वाली आग से क्षेत्र की जैव विविधता और उत्पादकता का ह्रास होता है:- रवींद्र कुमार

जिला ब्यूरो टेकलाल महतो की रिपोर्ट

  • गोला/रामगढ़। आजसू छात्र संघ गोला प्रखंड अध्यक्ष रवींद्र कुमार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर लोगों को बताया की भारत के लगभग 7 लाख, 65 हजार 210 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जंगल फैला है। इसमें से लगभग 6 लाख, 39 हजार छह सौ किलोमीटर क्षेत्र में किसी न किसी तरह के वन हैं। भारत के वनों में कई तरह की जैव विविधता मिलती है। लेकिन ईंधन, चारे, लकड़ी की बढ़ती हुई माँग, वनों के संरक्षण के अपर्याप्त उपाय और वन भूमि के गैर-वन भूमि में परिवर्तित होने से वे खत्म होते जा रहे हैं। जंगल में लगने वाली आग जैव विविधता और जंगल की उत्पादन क्षमता में कमी का मुख्य कारण होती है। जंगल में आग लगना एक आम बात है और पुराने समय से ही ऐसा होता रहा है। महाभारत एवं रामायण जैसे ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख है। जंगल के पर्यावरण में घुसपैठ से असन्तुलन बनने और आग नियन्त्रण का समुचित प्रशिक्षण न होने से आज इस तरह की घटनाएँ बहुत बढ़ गई हैं। वन क्षेत्र के लिए वित्तीय आवंटन में कमी और वन आग नियन्त्रण की व्यवस्था को कोई प्राथमिकता न दिया जाना भी आग को रोकने में हमारी असफलता का कारण रहा है।भारत का 92 प्रतिश्ता से अधिक वन क्षेत्र सरकार के नियन्त्रण में है। जंगल की आग पर नियन्त्रण सहित वन प्रबन्ध का जिमा राज्यों के वन विभागों के पास है। इसको देखते हुए ‘वन-आग’ प्रबन्ध के लिए एक राष्ट्रीय योजना तैयार करनी जरूरी है ताकि इस सम्बन्ध में राज्यों को स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल सकें और इस दिशा में राष्ट्रीय उद्देश्यों को हासिल करने के लिए गतिविधियों में तालमेल बन सके। 1988 की राष्ट्रीय वननीति में भी जंगलों में लगने वाली आग पर नियन्त्रण के लिए खास मौसम में विशेष सावधानी बरतने और इसके लिए आधुनिक तरीके अपनाने की बात साफतौर पर कही गई है लेकिन अभी तक वन आयोजना और व्यवस्था को वह प्राथमिकता नहीं मिली है जो मिलनी चाहिए थी।आगे उन्होंने वन विभाग से निवेदन करते हुए कहा की पतझड़ के मौसम में ग्रामीण इलाकों में आने वाले जंगली क्षेत्रों में थोड़ा सक्रिय भूमिका निभाएं,क्योंकि अक्सर इसी मौसम में जंगलों में आग लगते हुए देखा गया है।
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