आकांक्षा सक्सेना, ब्लॉगर , रांची । भारत में ही प्रतिवर्ष हिंदी दिवस पर बड़ी-बड़ी संगोष्ठी और अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं पर हास्यापद दृश्य तब हो जाता है जब हिंदी के प्रोफेसर के बच्चे विदेश में जाकर पढ़ते हैं और उनके घर की टेबल पर अंग्रेजी पत्रिका और अंग्रेजी उपन्यास शोभायमान रहते हैं। सचमुच
कितनी विडम्बना है कि हर देश की उसकी एक भाषा है और जो वहां पढ़ने जाता है उसे उस भाषा की परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य है पर हमारा भारत जो हर तरह की विविधता में एकता का प्रतीक माना गया है। यह सही है कि आप सभी भाषाओं को सम्मान दें पर जो भारत माता के माथे की बिंदी हिंदी है उसे राष्ट्रभाषा घोषित करें । अक्सर यह सवाल उठते रहे हैं और लगता है सबसे बड़ा कारण यही है कि सरकार किसी राज्य के बड़े वोटबैंक को दुखी न करके इस पर मौन ही रहती है और शांत चित्त हो मंथन किया जाये तो हिंदी जिस तरह उत्तर भारत के लोगों की मां है बिल्कुल उसी प्रकार तमिल, दक्षिण भारत के लोगों की माँ समान है बस यही भावनाएं हर राज्य की है जैसे बंगाल की बंगाली… बस इसीलिए किसी की भावनाएं आहत न हों, हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जा सका और यह सिर्फ़ राजभाषा बनकर रह गयी पर विश्व भर में जो सम्मान आज हमारी हिंदी को मिल रहा है वो आचंम्भित करता है और हमें गर्व की सच्ची अनुभूति कराता है।
जय हिंद जय हिंदी