जमशेदपुर । शहरों से गुजरते वक्त आपने अक्सर रोड पर लोहे के बैरियर लगे देखे होंगे. अमूमन ट्रैफिक पुलिस जब हेलमेट चेकिंग जैसा कोई अभियान चलाती है, तो सड़कों पर ये बैरियर कुछ ज्यादा ही संख्या में दिखाई देते हैं. जमशेदपुर में भी ऐसे बैरियर देखे जा सकते हैं, वैसे तो इन बैरियर के ऊपर लिखा होता है, “जमशेदपुर पुलिस आपकी सेवा में”. लेकिन दरअसल इस पर लिखा होना चाहिए था “जमशेदपुर पुलिस आप की ताक में”. जी हां, जमशेदपुर की ट्रैफिक पुलिस ताक में ही रहती है. वे पेड़ों के पीछे, किसी खंभे की आड़ में और किसी अंधेरी गली के कोने पर छुप कर वाहन चालकों का इंतजार करते हैं. ठीक वैसे ही, जैसे बगुला शांत भाव से पानी में खड़ा होकर मछली का इंतजार करता है, या कोई बिल्ली दम साधे अपने पास से गुजरते चूहे की प्रतीक्षा में बैठी रहती है. जैसे ही कोई संभावित शिकार नजर आया, अचानक कोई सिपाही प्रकट होता है और गुजरती हुई बाइक पर लपक पड़ता है. कभी हैंडल पकड़कर, कभी टायर में डंडा फंसा कर और कभी बाइक चलाते आदमी का हाथ पकड़कर उसे रोकने की कोशिश करता है. हकबकाया बाइक सवार भागने की कोशिश में कई दफा गिर कर हड्डियां तुड़वा बैठता है, तो कई बार पुलिस वाले से ही भिड़ जाता है.

यह अलग बात है कि ट्रैफिक पुलिस ट्रैफिक कंट्रोल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाती. बिष्टुपुर गोलचक्कर और बिष्टुपुर लाइट सिग्नल के पास रेड लाइट जंप करने वालों को पकड़ने के लिए एक भी सिपाही नहीं दिखेगा, लेकिन बिष्टुपुर थाना के सामने से कैंची मार कर मुड़ जानेवालों को धरने के लिए आधा दर्जन पुलिसवाले छुप कर बैठे रहते हैं. शहर भर में सड़क किनारे से लेकर चौक-चौराहे पर यातायात पुलिस ट्रैफिक कंट्रोल करने का काम छोड़ कर वाहन चालकों को पकड़ने और उनसे पैसा वसूलने में जुटी रहती है. लगता है कि पूरी की पूरी ट्रैफिक पुलिस को राजस्व संग्रह का लक्ष्य दे दिया गया है, लोग वर्दी वालों से डरते हैं, इसलिए कभी फाइन कटा कर तो कभी कुछ ले-देकर जान छुड़ाकर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझते हैं.

पुलिस को फाइन करने का अधिकार इसलिए दिया गया होगा, ताकि जो लोग इरादतन नियम-कायदों का पालन नहीं करते हैं, उन्हें दंडित किया जाये. लेकिन पुलिस खुद भी न तो नियम कायदे का पालन करती है, न ही लोगों को ऐसा करने को प्रेरित करती है. इसके बजाय उसे चालान काटना और पैसा वसूलना ज्यादा रास आता है.

है. राजधानी रांची में की बात करें, तो वहां ट्रैफिक की बेहतर व्यवस्था है. ट्रैफिक के सिगनल हैं. उन सिगनलों पर पुलिस रहती है. जहां सिगनल नहीं हैं, वहां भी ट्रैफिक वाले यातायात नियंत्रित करते हैं. वहां आपने रेड लाइट जंप किया या ट्रैफिक नियम तोड़ा, तो लाल बत्ती पर लगा कैमरा आपकी फोटो खींच लेगा और चालान आपके घर डाक से पहुंचा दिया जायेगा. रांची यातायात पुलिस के पोर्टल पर आपकी गाड़ी नंबर के साथ गाड़ी की तस्वीर और चालान की रकम सब दिखाई देती है. आप ऑनलाइन फाइन जमा कर सकते हैं. लेकिन जमशेदपुर जैसे हाइटेक कॉस्मोपॉलिटन शहर में पुलिस अभी भी मैनुअल चालान काटती है. बड़े गर्व से राजस्व वसूली के आंकड़े भी जारी होते हैं, जो हर साल बढ़ते जाते हैं. वैसे तो सरकार के पास निबंधन, अंचल, खनन, वाणिज्य कर जैसे विभाग हैं, जिनके माध्यम से राजस्व संग्रह किया जाता है. लेकिन जमशेदपुर में ट्रैफिक पुलिस विभाग राजस्व वसूलने में अव्वल चल रहा है.

जमशेदपुर ट्रैफिक पुलिस के आंकड़ों से लगता है कि यहां के लोग ट्रैफिक नियमों को तोड़ने में सबसे आगे हैं, लेकिन आंकड़े हमेशा पूरा सच नहीं बताते. टारगेट पूरा करने के चक्कर में ज्यादतियां भी होती हैं, जिन गलतियों पर चेतावनी दी जा सकती है, उनसे भी फाइन वसूल लिया जाता है. लेकिन सिर्फ निजी दोपहिया और चारपहिया वाहन चालक ही ट्रैफिक के नियम नहीं तोड़ते. पुलिस सड़क किनारे गाड़ी लगाने पर फाइन ठोक देती है. गाड़ी उठा ले जाती है, लेकिन रोड साइड लगे ठेलों, खोमचों और रेहड़ीवालों को खुली छूट है. ऑटो वाले यातायात नियमों को रौंदते हुए शहर भर में दनदनाते फिरते हैं, उनको किसी बैरियर पर रोकने की हिम्मत किसी पुलिसवाले में नहीं है. क्यों नहीं है, इसका जवाब किसी से छिपा नहीं है. पुलिस अपना काम करे, इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन इस शहर में न तो पर्याप्त ट्रैफिक सिगनल हैं, न ही सड़कें. अचानक कहीं का चौराहा गायब हो जाता है और कहीं कोई तिराहा अकस्मात प्रकट हो जाता है. अब पुलिस से कौन पूछे कि यह जहां एक पुल पर सालों से घंटों जाम लगता है और यातायात पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है, वहां चालान काटने में इतनी तेजी क्यों दिखायी जाती है?