पाकुड़ । भाद्र पद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का प्रतीक अनंत चतुर्दशी का व्रत 19 सितंबर दिन रविवार यानी आज है पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापर में 1 मन भटक रहे पांडवों ने इस व्रत को श्रीकृष्ण के बताने के अनुसार किया गया।
पुरोहित संतोष तिवारी ने कहा कि इस दिन व्रत रखने वालों को दोपहर तक अन्य ग्रहण नहीं करना चाहिए दोबारा स्नान आदि करके व्रत के नियमित बने मिष्ठान पुआ पकवान फल फूल लेकर मंदिरों पर लोक कथा सुनते हैं व्रत रखने वाले को सूर्यास्त से पहले तक जल पीने की छूट रहती है इस दिन नमक का सेवन नहीं होता है अनंत सूत्र पुरुष दाहिने हाथ और महिलाएं बाएं हाथ में धारण करती है अनंत के धागे में 14 घंटे होती है अनंत चतुर्दशी की पूजा सूत्र का बड़ा महत्व है इस व्रत में अक्षत दूर्वा शुद्ध रेशम या कपास के सूत्र से बने हल्दी से रंगे हुए 14 गांठ के अनंत सूत्र भगवान विष्णु के सामने में रखकर पूजा की जाती है फिर अनंत देव को ध्यान करके शुद्ध मन से अनंत जिसकी पूजा की गई उसे बांधते हैं इस व्रत में खीरा का महत्व होता है पुरोहित संतोष तिवारी के के साथ कथा वाचक – प्राचीन काल में सुमन तो ब्राह्मण की सुशीला कन्या कौन दिल ऋषि को ब्याही थी उसने पत्नी से पूछ कर अनंत व्रत धारण किया एक बार कोई योग बस अनंत के धागे को तोड़कर आग में फेंक दिया जिससे उसकी संपत्ति नष्ट हो गई जिससे वह दुखी होकर बन में चला गया बन बन भटक ने लगा उसके बाद बंद में आम गौ वृष खर पुष्कारिणी और वृद्ध ब्राह्मण मिला ब्राह्मण सिंह अनंत देव थे ब्राह्मण रूपी अनंत देव उसे लेकर गए और बताया कि वह आम वेद पाठी ब्राह्मण था विद्यार्थियों को न पढ़ाने से वह आम हुआ गांव पृथ्वी थी वीजा परण से गई हुई ब्रिज धर्म था खर क्रोध और पुष्कारिणी बहने थी दान आदि परस्पर लेनदेन से पुष्कर्णी हुई और वृद्ध ब्राह्मण में हूं अब तुम घर जाओ यदि रास्ते में आम आदमी मिले तो उससे कहते जाना और दोनों स्त्री पुरुष व्रत करो सब आनंद होगा इस प्रकार ब्राह्मण अंतर्ध्यान हो गए दोनों ने मिलकर 14 वर्ष तक व्रत किया व्रत व्रत की अवधि पूरी होने पर भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को उद्यापन हुआ और ब्राह्मण के सारे मनोकामनाएं पूरा हुई फिर से ब्राह्मण धनी हो गया और आनंद के धागों को अपने हाथों में बांधा 30 दिन दही और दूध का मंथन होता है और पंडित जी के द्वारा कहा जाता है कि मिले नहीं मिले मिले नहीं मिले मिले नहीं मिले उसके बाद अंत भगवान मिले नहीं मिले हां मिल गए इस प्रकार कथा की समाप्ति पर होती है और सभी सभी दान दक्षिणा देकर वापस लेकर अपने अपने घर को जाते हैं इस कथा पूजन में जजमान प्रदीप भगत समेत समेत अनेकों श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिली।