रांची । राज्य के सबसे बड़े हॉस्पिटल रिम्स में इलाज के लिए मरीज दूर दराज के इलाकों से आते है. जहां पर डॉक्टर मरीजों का इलाज करने के बाद उन्हें दवाएं प्रिस्क्राइब करते है. लेकिन डॉक्टर दवा का नाम कैपिटल लेटर में लिखना भूल गए है. ऐसे में दवा का नाम केवल दवा दुकानदार ही पढ़ पाते हैं. वहीं कई दवाओं का नाम तो दुकानदार भी नहीं पढ़ पा रहे हैं. इतना ही नहीं प्रिस्क्रिप्शन से जेनरिक दवाएं भी साफ हो गई है. जिसका खामियाजा रिम्स में इलाज के लिए आने वाले मरीज भुगत रहे है. इसके बावजूद प्रबंधन कोई एक्शन नहीं ले रहा है.

कैपिटल लेटर में लिखने का था आदेश

स्वास्थ्य विभाग ने 2015 में ही सभी सरकारी डॉक्टरों को आदेश जारी किया था. जिसमें दवाओं के नाम कैपिटल लेटर में लिखने को कहा गया था. वहीं दवाओं के जेनरिक ब्रांड का नाम भी प्रिस्क्राइब करने को कहा गया था. जिससे कि मरीजों को भी दवा का नाम स्पष्ट पता चल जाए. लेकिन रिम्स में कुछ डॉक्टरों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी डॉक्टरों का एक ही हाल है.

कागज की पर्ची में लिखते है दवा

हॉस्पिटल मे एडमिट मरीजों के लिए पर्ची में दवा का नाम लिखकर देना है या फिर मरीजों के ट्रीटमेंट चार्ट पर. लेकिन रिम्स में मरीजों को कागज की पर्ची में नाम लिखकर थमा दिया जाता है. जिससे कि यह समझ पाना मृश्किल हो जाता है कि दवा रिम्स के डॉक्टर ने लिखी है या किसी और ने. इस चक्कर में मरीजों के परिजनों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

केस 1

फलिंदर मुंडा के परिजन को सांप ने काट लिया था. इसके बाद डॉ विद्यापति के यूनिट में उसे इलाज के लिए एडमिट कराया गया. जहां डॉक्टर ने जो दवा लिखी वह हॉस्पिटल में नहीं थी. वहीं जन औषधि केंद्र में भी दवा उसे नहीं मिली. इसके बाद दवा के लिए उसे प्राइवेट मेडिकल में जाना पड़ा. चूंकि यह दवा जेनरिक में नहीं थी.

केस 2

चंदन कुमार की 5 महीने की बेटी को डॉ एके चौधरी के पीडिया वार्ड में एडमिट किया गया है. जहां डॉक्टर ने बाहर से दवा लाने को कहा और पर्ची थमा दी. डॉक्टर ने उन्हें जो सिरप लिखा वह जन औषधि में भी नहीं मिली. प्राइवेट मेडिकल में इस दवा के लिए पैसे खर्च करने पड़े. जिससे समझा जा सकता है कि कैसे डॉक्टर भी ब्रांडेड दवाएं लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे.

केस 3

रघुनाथ के बेटे नीतीश को मेडिसिन वार्ड में एडमिट किया गया है. डॉक्टर ने उन्हें जो भी दवाई लिखी वह जन औषधि केंद्र में उपलब्ध ही नहीं है. अब तक वह ₹15000 से अधिक की दवा खरीद चुके हैं.