लोहरदगा l नवरात्रि के आठवें दिन बुधवार को भक्ति भाव से भक्तो द्वारा देवी महागौरी का पूजन किया गया। वहीं पूजन में बाधाएं उतपन न हो इसके लिए सभी पंडाल में पुलिस प्रशासन का सुरक्षा व्यवस्था का पुख्ता इंतजाम किया गया है। वहीं दुर्गा पूजा समिति द्वारा व्यवस्था में नजर बनी हुई है। सेन्हा प्रखंड क्षेत्र के बदला, बरही, झखरा, मेन रोड सेन्हा, सती मंदिर सेन्हा, चन्दकोपा सहित सभी पूजा पंडालों में तथा मंदिरो में भक्ति भाव से महाष्टमी के पावन अवसर पर देवी महागौरी का पूजन किया गया। माँ अक्षत सुहाग की अधिष्ठात्री देव् हैं। इस लिए सुहागिन महिलाए और कुंवारी कन्याओं भी देवी माँ का पूजन करती हैं। माँ महागौरी नारी शुलभ गुणों के लिए विख्यात हैं। इनकी आराधना से संसार की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इनकी उपमा शंख,चंद्र और कुंद के पुष्प से की गई है। श्वेत वस्त्र धारण करने वाली देवी महागौरी का वाहन वृषभ है। चतुर्भुजी माँ एक हाथ अभय मुद्रा में है तथा दूसरा हाथ त्रिशूल धारण की हुई है। तीसरे हाथ में डमरू और चौथा हाथ आशीर्वाद मुद्रा में है। देवी शास्त्र के अनुसार भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए देवी ने कठोर तप किया। तप के कारण इनका पूरा शरीर काला पड़ गया था। तप से प्रसन्न हो कर भगवान शंकर ने इन्हें गंगाजल से गौर वर्ण किया। श्रीदुगासप्तशती के अनुसार असुरों को आसक्त करने के लिए देवी गौरवर्ण में अवतरित हुई। जिसे चंड-मुंड ने देखकर शुम्भ निशुम्भ को बताया। तब उसने इनको प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के छल प्रपंच किया और अंततः देवी ने धूम्रलोचन,रक्तबीज,चंड-मुंड तथा शुम्भ-निशुम्भ आदि समस्त असुरों का वध महागौरी के स्वरूप में माँ किया था। संग्राम में ये अनेकोनेक स्वरुपों के साथ प्रकट हुई और फिर महागौरी के रूप में एकाकार हो गई। इसलिए नवरात्र में अष्टमी के दिन सम्पूर्ण ऐश्वरय तथा अखण्ड सुहाग प्राप्ति के लिए पुरुष तथा महिलाएं माता गौरी का पूजन करती हैं। और नवमी को बली पड़ने के उपरान्त पारन करते हैं। महाष्टमी का पूजन कर भक्तों ने सुख समृद्धि का कामना किए।