स्वाध्याय परिवार मना रही है दादाजी का 100वें जन्म शताब्दी ।

रामगढ़ ( गोला ) | टेंपलटन रेमन मैग्सेसे और पद्म विभूषण जैसे पुरस्कारों से सम्मानित परम पूजनीय पांडुरंग शास्त्री आठवले जी पूजनीय दादाजी का जन्म 19 अक्टूबर 1920 के दिन हुआ था। विश्व मान्य तत्वचिंतक वैश्विक प्रतिभा होने के बावजूद दादाजी एक माँ के समान झुके हैं। जिस प्रकार कोई माँ कमर से झुक कर अपने बालक को उठाती है। उसी प्यार से दादाजी ने मानव मात्र को अपने पास बैठाया है। पूज्य दादा जी ने सागरी, नागरी,आगरी बनवासी, क्षत्रिय, देवीपूजक ऐसे अनेक मानव पूंजो को अपने निकट लिया है। इस कार्य के लिए दादाजी संपूर्ण जीवन गांव- गांव में गए हैं। दादाजी मात्र तत्वज्ञानी ही नहीं है। परंतु वे क्रियाशील तत्वचिंतक हैं। अर्थात उन्होंने केवल कहा नहीं केवल उपदेश नहीं दिए परंतु स्वयं अपने जीवन को वैसा ही जीकर निदर्शन(DEMOSTRATION) किया है। विश्व के प्रश्नों का जवाब अनेक प्रयोगों की श्रृंखला से विश्व को दिया है। श्रेष्ठ विचार तो बहुत ही पुस्तकों में है। लेकिन अगर मानव को बदलना होगा तो मानव को मानव के पास बिना स्वार्थ के प्रेम और विचार लेकर जाना पड़ेगा, उसके लिए समय देना होगा।
स्व का अभ्यास करना होगा और गीता में भी इस प्रकार की भक्ति को श्रेष्ठ भक्ति कही गई है। ऐसा पूज्य दादाजी ने समझाया आज जबकि मानव का अस्तित्व ही संकट में आया है । समग्र विश्व मानव उलझनो में उलझा हुआ है। दिशा विहीन लग रहा है। तब आधुनिक युग के इन प्रणेता के विचारों की समाज को सतत आवश्यकता है। ऐसा लगता है।
आज मानव की कीमत पद ,प्रतिष्ठा, और पैसे से ही नापी जाती है लेकिन मानव दैवी अंश(ममैवांशो जीवलोके) हैं । इस समझ के साथ उसका गौरव नहीं होता हैं । तू बड़ा पूर्ण है तो मैं छोटा पूर्ण हूं विश्व के चलाने वाली शक्ति मेरे साथ है(सर्वस्य चाहं हृदय सन्निविष्टो ) फिर भी मैं अपने आप को इतना छोटा हल्का समझता हूं ।
तब मेरे में राम मेरा गौरव दूसरे में राम दूसरा का गौरव सभी में राम सभी का गौरव हमारा धर्म मनुष्य गौरव यह समझने और समझाने के लिए स्वाध्याय परिवार अंतिम मानव तक पहुंचता है । तेरी मेरी क्या है सगाई हम दोनों हैं भाई भाई , समझ कर मनुष्य गौरव का गीता विचार समाज में प्रतिस्थापित करता आ रहा है। वर्ष 1990 में स्वाध्याय परिवार ने दादाजी के पास उनके जन्मदिन के उत्सव को मनाने की सम्मति (अनुमति) मांगी तो उन्होंने कहा अगर भगवान का कार्य एक कदम भी आगे बढ़ता हो तभी उत्सव मनाना है। उस दिन से विश्व के 23 देशों में और भारत के 18 राज्यों में विस्तृत स्वाध्याय परिवार 19 अक्टूबर का उत्सव मनुष्य गौरव दिन के अवसर पर गांव गांव में भक्ति फेरी करके उत्सव मनाते हैं। भक्ति फेरी अर्थात सुदूर गांवो में बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति को दैवी भाई के रूप में मिलने जाना गांव में ही रहना अपना टिकट ,टिफिन, लेकर जाना चाय की भी अपेक्षा नहीं रखना अपने खर्च से जाना रसोई भी अपने हाथ से बनाना भक्तिफेरी अर्थात अपना समय और शक्ति प्रभु कार्य के लिए खर्च करना यहां उल्लेखनीय बात यह है कि दादा जी की सुपुत्री जय श्री तलवलकर कोरोना की महामारी काल में भी समग्र परिवार के साथ विभिन्न माध्यमों से जुड़कर समग्र परिवार का उत्साहवर्धन करती रही है। कोरोना काल के कुछ अंश में आया निराशाजनक वातावरण में भी विविध आयोजन विविध प्रार्थना पुस्तक पढ़ना उत्सवो की पारिवारिक रूप से मनाने का आयोजन देकर समग्र परिवार को मानसिक स्वास्थ्यता प्रदान कर रही है।
मनुष्य गौरव दिन यह नाम पूजनीय दादाजी के वर्षगांठ को दिया गया है नाम नहीं है यह पूज्य दादाजी के 100 वर्ष की सिद्धि है । पूजनीय दादाजी ने लाखों लोगों के जीवन में मनुष्य गौरव का स्थिर किया है । 1958 में मुंबई से 18 भाई सौराष्ट्र में भक्तिफेरी करने के लिए निकले थे । 1991 में मनुष्य गौरव के दिन निमित्त पूरे भारत में से 40,000 भाई-बहन भक्तिफेरी में निकले थे और आज विश्व भर में लाखों भाई-बहन भक्तिफेरी करने निकलते हैं। यही SILENT YET SINGING REVOLUTION है। धर्म, जाति,सत्ता, संपत्ति इत्यादि विषमता तथा भेदभाव की पराकाष्ठा के इस काल में युगपुरुष के मनुष्य गौरव और हृदयस्थ भगवान की संकल्पना एकमात्र यही जवाब हो सकता हैं।ऐसा लगता है। मनुष्य गौरव निर्माता ऐसे दादाजी को कोटि-कोटि वंदन।