साहिबगंज। बिरसा मुंडा की जयंती समारोह को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने लिया है। भगवान बिरसा मुंडा आदिवासी मुंडा समाज के थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका अमूल्य योगदान को देखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में घोषित करने को मंजूरी दी है, साथ ही जनजातीय लोगों, संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास को मनाने की बात कही है। इसलिए 15 से 22 नवंबर 2021 तक ‘जनजातीय गौरव दिवस सप्ताह’ मनाया जाएगा।

उलीहातु का लाल बना भगवान बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 में झारखंड के खुंटी जिले के उलीहातु गांव में हुआ था। उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था, उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी मुंडा था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा साल्गा गांव में हुई, उसके बाद आगे की पढाई के लिए वे कोल्हान के चाईबासा जीईएल चर्च स्कूल गए। बिरसा मुंडा का मन हमेशा ब्रिटिश शासकों को देश को खदेडने की थी, वह हमेशा देश को अंग्रेजों से मुक्त करने के बारे में सोचा करते थे। फिर क्या था? उसने मुंडा समाज के लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट किया और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। 1894 में छोटानागपुर पठार में भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी, उस वक्त बिरसा मुंडा ने तन-मन से अपने लोगों की सेवा आगे बढकर की।

बिरसा मुंडा ने किया विद्रोह का नेतृत्व

बिरसा मुंडा ने 1 अक्टूबर को एक नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्रित किया। उन्होंने लगान माफी के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन किया। 1895 में ब्रिटिश शासकों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया।उसके बाद उसे हजारीबाग सेंट्रल जेल में दो साल के कारावास की सजा दी गई। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी। जिससे उन्होंने अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया, उन्हें उस इलाके के लोग “धरती आबा” के नाम से पुकारने लगे। इतना ही नहीं लोगों ने उनकी पूजा करना शुरू कर दिया। निरंतर उनका प्रभाव क्षेत्र बढता गया, जिससे मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।

बिरसा ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेजों के सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे। बिरसा मुंडा के साहस व पराक्रम के आगे अंग्रेजी हुकूमत भी परेशान था, बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा मुंडा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर – कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला दिय। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेजी सेनाओं से हुई, जिसमें अंग्रेजी सेना की हार हुई, लेकिन बाद में उसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारी की गई।

डोमबारी पहाड़ में हुआ था बडा संघर्ष

जनवरी 1900 में डोमबारी पहाड़ पर भी एक बडा संघर्ष हुआ था। जिसमें कई महिलाएं और बच्चे मारे गए थे। डोमबारी में बिरसा मुंडा एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे, तभी अंग्रेजों ने चालाकी से बिरसा मुंडा के शिष्यों को गिरफ्तार किया। उसको यातनाएं देने लगे, 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल से अंग्रेजों ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया। ब्रिटिश शासकों ने उसे रांची जेल में यातनाएं दी और उसे जान से मारने के लिए अंग्रेज के अधिकारियों ने जहर दे दिया। 9 जून 1900 को बिरसा ने अपनी अंतिम सांस ली।

बिरसा को आज भी भगवान की तरह पूजते हैं लोग

बिरसा मुंडा को आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छतीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में भगवान की तरह पूजते हैं। अंग्रेजी शासकों के लिए भले ही बिरसा मुंडा का अंत हो गया हो, लेकिन आदिवासियों के लिए आज भी वे जीवित हैं।