लिट्टीपाड़ा ( पाकुड़ ) । प्रखंड मुख्यालय से महज 7 किलोमीटर दूरी स्थित कड़कराम गांव आज भी ट्राँच लाइट के सहारे जीवन गुजार बसार कर रहे हैं।यहाँ की ग्रमीण बिजली, सड़क, पानी जैसे सभी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर है।इस गांव के ग्रामीण बुँद बुँद पानी के लिए तरस रहे हैं।सबसे पिछड़े लिट्टीपाड़ा प्रखंड के कड़कराम गांव के ग्रामीण उबड़ खाबड़ पत्थर रास्ते से ही आने जाने को मजबूर है।ग्रमीणों ने अपनी श्रमदान कर सभी गांव के लोग मिलकर अपनी मेहनत से आने जाने के लिए कुदल टमनी के सहायत से खोद खोद कर रास्ते बना डाला ।ग्रमीणों ने कहा कि कई हमलोगों ने सरकार दफ्तरों का चक्कर लगाते लगाते थक चुके हैं।परिणाम स्वरूप आज हम लोग अपने से ही सड़क बनाने को मजबूर हैं।सरकार की विकास योजना सिर्फ कागजतों के इतिहास के पन्नों में ही पढ़ने को मिलता है।यहां के गरीब आदिम जनजाति सामुदायिक के लोग विकास देखने के लिए तरस रहे हैं।हायरे हमर सोना झारखंड उबड़ खाबड़ पत्थर रास्ते।इस गांव के ग्रामीणों को झरनों के दूषित पानी पीकर प्यास बुझाने रही है।स्वास्थ्य, शिक्षा तो सिर्फ सपनों में देखते हैं यहां की ग्रामवासी।10मिनट के जगह पर दो घंटे लगते हैं।आने जाने के लिए।अब इसे साफ साफ समझ सकते हैं कि लिट्टीपाड़ा मे विकास की गंगा किस कदर बहती है।चारों तरफ आपके सरकार आपकी अधिकार आपके द्वार कार्यक्रम का आयोजन प्रखंड के प्रत्येक पंचायतों में होती है।लेकिन यहां की ग्रामीणों के लिए सरकार आपके द्वार कार्यक्रम महाज खानापूर्ति ही साबित हो रहे हैं।