अटका नरसंहार के आश्रितों को 24 साल बाद भी नहीं मिली नौकरी

रांची। अटका नरसंहार के 24 साल बाद भी आश्रितों को नौकरी का इंतजार है. यह घटना एकीकृत बिहार के समय हुई थी. आज से 24 साल पहले 7 जुलाई 1998 को गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड के अटका गांव में नरसंहार हुआ था. जिसमें भाकपा माओवादी के नक्सलियों ने दस लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. घटना के बाद बिहार की तत्कालीन सीएम राबड़ी देवी की ओर से आश्रितों को नौकरी दिए जाने की घोषणा भी की गई थी. लेकिन घटना के 24 साल बीतने के बाद भी आश्रितों को नौकरी नहीं मिली है.

पंचायत सभा में नक्सलियों ने की थी गोलीबारी

आज से 24 साल पहले 7 जुलाई 1998 को गिरिडीह जिले बगोदर थाना क्षेत्र स्थित अटका के दामऊवा मैदान में जमीन विवाद से संबंधित पंचायत चल रही थी. जिसमें कई लोग शामिल थे. इसी दौरान हथियार से लैस नक्सली पुलिस की वर्दी में पहुंचे और गोलीबारी शुरू कर दी. इस घटना में मुखिया मथुरा प्रसाद मंडल, धूपाली महतो, बिहारी महतो, दशरथ महतो, सरजू महतो, वीरेन पासवान, तुलसी मंडल, जगरानी महतो, सीताराम मंडल तथा सरकारी शिक्षक रघु मंडल की घटना स्थल पर ही मौत हो गई थी.

इस घटना के बाद एकीकृत बिहार की तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव घटनास्थल पर गये थे. अटका गांव में मृतक के आश्रितों के घर पहुंचकर लोगों को सांत्वना भी दी थी. मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सभी मृतक के परिजनों को सरकारी नौकरी, इंदिरा आवास और एक-एक लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की थी. जहां मुआवजा के तौर पर इंदिरा आवास और रुपए तो मिल गया. लेकिन मृतक के परिजन आज भी सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठे हैं.

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