सदर अस्पताल की हालत खस्ता

गिरिडीह। बिहार से अलग होकर झारखंड वर्ष 2000 में बना. दो दशक से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है. इतने वर्ष गुजरने के बाद भी गिरिडीह जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था का खस्ताहाल है. किसी समय जिले में अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था थी. सदर अस्पताल में मरीजों की अच्छी ट्रीटमेंट होती थी. इस अस्पताल में 1995 के जून माह में पेइंग वार्ड की शुरुआत हुई. तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ. दिगंबर झा काफी सक्रिय थे. पेइंग वार्ड के सभी बेड मरीजों से भरे रहते थे. शुरू के 10 दिनों तक मरीजों से मात्र 15 रुपये शुल्क लिए जाते थे. 11 वें दिन से 1 रुपया प्रतिदिन वसूले जाते थे. बहुत दिनों तक यह व्यवस्था नहीं चली. मेन पावर की कमी और रखरखाव के अभाव में वर्ष 1999 में यह व्यवस्था बंद होने के बाद दुबारा शुरू नहीं हुई.

1999 के बाद से ही सदर अस्पताल की व्यवस्था चरमराने लगी. आज स्थिति यह है कि लाचार या गरीब लोग ही इस अस्पताल में भर्ती होते हैं. संपन्न तबके के लोग यहां इलाज कराने नहीं आते.

25 वर्षों से नहीं हैं चर्म रोग विशेषज्ञ

सदर अस्पताल में 25 वर्षों से चर्म रोग विशेषज्ञ नहीं है. 23 वर्षों से ऑर्थो सर्जन नहीं है. रेडियोलॉजिस्ट का पद भी दो दशक से खाली पड़ा है.

सीसीटीवी से होती थी निगरानी

पूर्व डीसी उमाशंकर सिंह के कार्यकाल में सदर अस्पताल में सीसीटीवी कैमरे से कामकाज पर निगरानी रखी जाती थी. आधा दर्जन कैमरे डीसी की गोपनीय शाखा से कनेक्ट थे. पूर्व डीसी सदर अस्पताल की व्यवस्था पर निगाह रखते थे. उनके तबादले के बाद यह व्यवस्था ध्वस्त हो गई.

राज्य में कई सरकार आई और गई पर व्यवस्था नहीं सुधरी

विगत दो दशक में राज्य में कई दल सत्तासीन हुए. जिले के कई राजनेता मंत्री से लेकर सीएम तक बने. किसी ने भी सदर अस्पताल की व्यवस्था सुधारने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. बाबूलाल मरांडी पहले सीएम बने. बाबूलाल के कैबिनेट में चंद्रमोहन प्रसाद, रविंद्र राय व लालचंद महतो शामिल थे. सदर अस्तपताल की व्यवस्था जस की तस रही.

सुधार की कोशिश जारी

सिविल सर्जन डॉ. एसपी मिश्रा ने बताया कि व्यवस्था में सुधार की कोशिश जारी है. सदर अस्पताल में चिकित्सकों की कमी है. इस वजह से भी परेशानी है. कम संसाधन में बेहतर सेवा देने का प्रयास जारी है. सदर अस्पताल को पुराना गौरव फिर हासिल होगा. चिकित्सकों की कमी दूर करने के लिए राज्य सरकार को पत्र भेजा गया है.

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