सीएम के ताबड़तोड़ फैसलों से राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग तक दौड़ की बेचैनी क्यों ?

रांची। 25 अगस्त से झारखंड की राजनीति गरमाई हुई है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जुड़े ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में चुनाव आयोग का पक्ष राजभवन पहुंचने के बाद अब तक संशय के बादल नहीं छंटे हैं. यहां की राजनीति सांप सीढ़ी के खेल की तरह हो गई है. राजनीति के पंडितों के लिए अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है कि आने वाले समय में सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा. लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हालिया फैसलों से लग रहा है कि वह आने वाले तूफान की आहट से वाकिफ हैं. शायद यही वजह है कि उन्होंने कैबिनेट के जरिए तीन ऐसे बड़े फैसले लिए हैं जो झारखंड की राजनीति के केंद्र में रहते हैं.

उन्होंने 1 सितंबर 2022 को पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के प्रस्ताव को स्वीकृत कर पहला मास्टर स्ट्रोक लगाया . फिर 14 सितंबर को 1932 का खतियान को आधार बनाकर राज्य के स्थानीय निवासी की परिभाषा, पहचान व झारखंड के स्थानीय व्यक्तियों की परिणामी सामाजिक एवं अन्य लाभों के लिए विधेयक 2022 के गठन को मंजूरी देकर दूसरा मास्टर स्ट्रोक लगाया. इसी दिन पिछड़ों के लिए आरक्षण की सीमा को 14 फीसदी से 27 फीसदी, एसटी के लिए 26 से 28 फीसदी और एससी के लिए 10 से बढ़ाकर 12 फीसदी करने के प्रावधान संबंधी विधेयक के प्रारूप को मंजूरी देकर आरक्षण कोटी का प्रतिशत 77 फीसदी कर दिया है.

अब स्थानीयता और आरक्षण की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को सदन से पास कराकर लागू करने के लिए केंद्र से अनुरोध किया जाएगा. इन दो फैसलों की आड़ में हेमंत सोरेन ने राजनीति के बॉल को केंद्र के पाले में डाल दिया है. क्योंकि उन्हें मालूम है कि डोमिसाइल और आरक्षण की सीमा 73 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भी लिया था, जिसे झारखंड हाई कोर्ट खारिज कर चुका है. डेमोसाइल विवाद के कारण ही बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी. डोमिसाइल की आग में पांच लोगों की जान गई थी. रांची में कर्फ्यू लगाना पड़ा था. उसी का नतीजा था कि उन्होंने भाजपा छोड़कर जेवीएम पार्टी बना ली थी. लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में हेमंत सोरेन का यह फैसला मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है जो 20 साल पहले पहले बाबूलाल मरांडी के लिए पेन स्ट्रोक साबित हुआ था.

अब इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने ही बयान से इतर फैसले क्यों ले रहे हैं. क्योंकि इसी साल बजट सत्र के दौरान सदन में खुद उन्होंने कहा था कि खतियान आधारित स्थानीय नीति कोर्ट में नहीं टिक पाएगी. दूसरी तरफ राजभवन और चुनाव आयोग पर दबाव बना रहे हैं कि आखिर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट पर फैसले की जानकारी उन्हें क्यों नहीं दी जा रही है. एक तरफ फैसलों के मास्टर स्ट्रोक तो दूसरी तरफ आयोग का मंतव्य जानने की बैचेनी के आखिर क्या हैं मायने. अगर सरकार जनहित में बड़े फैसले ले रही है तो फिर पिछले दिनों अपने विधायकों की लतरातू डैम की सैर के बाद रायपुर के मेफेयर रिसॉर्ट में ले जाने के क्या मायने हैं.

वरिष्ठ पत्रकार वैद्यनाथ मिश्र का कहना है कि दरअसल, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने चुनावी वादे को पूरा कर रहे हैं. वह अपने मतदाता वर्ग के बीच परसेप्शन बना रहे हैं कि हम आपके साथ धोखेबाजी नहीं कर रहे हैं. जो वादे किए थे उसे निभा रहे हैं. इसलिए डोमिसाइल और आरक्षण पर फैसला लिया. वह जानते हैं कि दोनों फैसले कोर्ट में खारिज होंगे. अब उनके पास कहने के लिए होगा कि मैंने जो वादा किया था, उसे पूरा करने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि खनन पट्टा मामले में चुनाव आयोग के ट्रिब्यूनल में सुनवाई हुई थी. इसलिए सीएम को जानने का हक है कि चुनाव आयोग ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में राजभवन को क्या मंतव्य भेजा. वरिष्ठ पत्रकार वैद्यनाथ मिश्र ने कहा कि सरकार अकारण भय में घिरी दिख रही है. कुछ कचोट रहा है. इसी वजह से यह सब हो रहा है. मुख्यमंत्री को भय है कि कहीं सरकार न चली जाए. इसी वजह से विधायकों को घुमाना और सदन में बहुमत साबित करने जैसी कवायद की गई है.

वरिष्ठ पत्रकार रवि प्रकाश का मानना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ताज़ा निर्णयों में से अधिकतर का वादा उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किया था. मसलन, 1932 का खतियान के आधार पर झारखंड के लोगों की स्थानीयता का निर्धारण. लिहाज़ा, इसे ताज़ा सियासी उथल-पुथल से जोड़ तो सकते हैं लेकिन यह पूरी तरह वाजिब नहीं होगा. इसी तरह ओबीसी, एससी और एसटी की आरक्षण की सीमा बढ़ाना भी जेएमएम और कांग्रेस दोनों का चुनावी वादा था.

आरजेडी भी इसकी वकालत कर रही थी इसलिए इस सरकार के पास तर्क है कि वह अपना चुनावी वादा पूरी कर रही है. इसी आधार पर राज्य की जनता ने उनके गठबंधन को वोट देकर बहुमत से अधिक सीटें दी थी. पेंशन की पुरानी व्यवस्था की बात करें तो इसे ग़ैर बीजेपी राज्यों की कुछ सरकारों ने झारखंड से पहले यह निर्णय लिया था. हेमंत सोरेन की सरकार ने भी यह निर्णय लिया है. दरअसल, मुख्यमंत्री यह दिखाना चाहते हैं कि वे जनता के हित में कोई भी निर्णय लेने से पीछे नहीं हटने वाले. हां, उनके निर्णयों में आदिवासी कल्याण योजनाओं की प्राथमिकता है, क्योंकि उनकी सियासी ज़मीन उसी पर खड़ी है. वे आदिवासियों के बड़े नेता शिबू सोरेन की विरासत संभाल रहे हैं और आने वाले सालों में वे स्वयं को देश स्तर पर आदिवासियों के नेता के तौर पर प्रस्तुत करना चाहते हैं.

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