नई दिल्ली। देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने और कर्ज की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कैश फ्लो आधारित लेंडिंग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस व्यवस्था में कारोबार को ऋण देने का फैसला केवल जमीन, मकान या दूसरी संपत्ति को गिरवी रखने की क्षमता पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक कमाई और कर्ज चुकाने की योग्यता के आधार पर किया जाता है।
भारत में बड़ी संख्या में छोटे कारोबारी किराना दुकान, मेडिकल स्टोर, कपड़ों की दुकान, मोबाइल एक्सेसरीज और छोटे विनिर्माण व्यवसाय चलाते हैं। इनमें से कई कारोबार नियमित कमाई करते हैं, लेकिन उनके पास बैंक से ऋण लेने के लिए पर्याप्त संपत्ति या मजबूत क्रेडिट इतिहास नहीं होता। ऐसे कारोबारियों के लिए कैश फ्लो आधारित ऋण व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है।
क्या है कैश फ्लो आधारित लेंडिंग?
इस मॉडल में बैंक और वित्तीय संस्थान यह आकलन करते हैं कि किसी कारोबार में कितनी आय हो रही है, पैसा कितनी नियमितता से प्राप्त होता है और व्यवसाय अपनी आमदनी से किस तरह ऋण की किस्तें चुका सकता है।
इसके लिए बैंक स्टेटमेंट, जीएसटी रिटर्न, यूपीआई लेन-देन, भुगतान का रिकॉर्ड और अन्य वित्तीय जानकारियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे कारोबार की वित्तीय स्थिति को बेहतर तरीके से समझने और ऋण संबंधी निर्णय लेने में मदद मिलती है।
करोड़ों MSME के सामने अब भी ऋण की चुनौती
लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक देश में 8.7 करोड़ पंजीकृत MSME होने का उल्लेख किया गया है। वहीं, मार्च 2026 तक लगभग 3.6 करोड़ उद्यमों के औपचारिक ऋण का लाभ लेने की जानकारी दी गई है।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि छोटे कारोबारों तक औपचारिक ऋण पहुंचाने की दिशा में अभी भी काफी काम करने की जरूरत है। कैश फ्लो आधारित लेंडिंग से उन कारोबारियों को भी वित्तीय सहायता मिलने की संभावना बढ़ सकती है, जिनके पास पर्याप्त गिरवी योग्य संपत्ति नहीं है।
डिजिटल भुगतान के साथ नकद कारोबार का भी आकलन जरूरी
यूपीआई, बैंकिंग रिकॉर्ड और अकाउंट एग्रीगेटर जैसी डिजिटल व्यवस्थाओं ने कारोबार की वित्तीय गतिविधियों का आकलन करना आसान बनाया है। हालांकि, देश के छोटे शहरों और ग्रामीण बाजारों में नकद लेन-देन अब भी महत्वपूर्ण है।
ऐसे में केवल डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर ऋण देने से किसी कारोबार की वास्तविक आय का पूरा आकलन नहीं हो सकता। वित्तीय संस्थानों को जरूरत के अनुसार स्टॉक, खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, सप्लायर के बिल और कारोबार के वास्तविक संचालन की भी जांच करनी चाहिए।
तकनीक और जमीनी जांच से बेहतर होगा जोखिम आकलन
विश्लेषणात्मक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल कारोबार की गतिविधियों, स्टॉक की स्थिति और स्थान संबंधी जानकारी का आकलन करने में किया जा सकता है। हालांकि, इन तकनीकों से मिलने वाले संकेतों की सत्यता की जांच जरूरी है। डिजिटल आंकड़ों के साथ मानवीय निरीक्षण और जिम्मेदार ऋण मूल्यांकन से गलत ऋण निर्णयों का जोखिम कम किया जा सकता है।
कर्ज की उपलब्धता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, MSME क्षेत्र में ऋण का दायरा बढ़ाने के लिए केवल अधिक कर्ज उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। ऋण की राशि, भुगतान की समयसीमा और किस्तों का निर्धारण कारोबार की आय के अनुरूप होना चाहिए। क्रेडिट गारंटी योजनाएं भी पात्र छोटे उद्यमों तक वित्तीय सहायता पहुंचाने में मदद कर सकती हैं।
कैश फ्लो आधारित लेंडिंग का उद्देश्य छोटे कारोबारों की वास्तविक वित्तीय क्षमता को पहचानना है, ताकि योग्य उद्यमियों को अनावश्यक संपत्ति संबंधी बाधाओं के कारण ऋण से वंचित न रहना पड़े। सही आकलन और प्रभावी निगरानी के साथ यह व्यवस्था छोटे कारोबारों की कार्यशील पूंजी की जरूरत पूरी करने और उनके विस्तार में सहायक बन सकती है।
लेख का आधार: भारत फाइनेंशियल इनक्लूजन लिमिटेड के रिटेल चीफ बिजनेस ऑफिसर आशीष पिपलिया के विचारों पर आधारित मूल रिपोर्ट।
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