लोहरदगा: जननी शिकार आदिवासी समाज का अनोखा और यादगार त्यौहार है। यह त्यौहार आदिवासी समाज में महिलाओं के ऐतिहासिक योगदान और उनकी शक्ति का प्रतीक माना गया है। जो 12 वर्ष में एक वार महिलाएं इस परंपरा को निभाने के लिए शिकार पर निकलती है। जिसे जनी सेंदरा भी कहा जाता है। इन्ही तथ्यों के तहत लोहरदगा जिले के सेन्हा प्रखंड अंतर्गत झालजमीरा पंचायत के घाटा गांव में जनि शिकार आयोजन हुआ। जिसमें हिरही से आए महिलाओं को स्वागत आदिवासी रीति रिवाज से किया गया। विदित हो कि आदिवासी समाज के महिलाओं ने पुरुष भेष भूषा में पारंपरिक हथियार के साथ जंगल को रवाना होते है। इस परंपरा को झारखंड राज्य के अलावे बिहार और छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज द्वारा मनाया जाता है। जो महिलाओं की वीरता को दर्शाता है और यह परंपरा अत्यंत अनोखा और दुर्लभ त्यौहार के रूप प्रसिद्ध है। जनी शिकार ऐतिहासिक महत्व है यह त्यौहार बिहार राज्य के रोहतासगढ़ किले पर हुए मुगलों के आक्रमण को याद दिलाती है। और महिलाओं ने पुरुष के पारंपरिक भेष भूषा को अपना कर हथियार से लैस हो मुगल शासक से लोहा लिया और पराजय कर मुगलों को भागने पर मजबूर किया गया था। उसी दिन से आदिवासी समाज महिलाओं के सम्मान में 12 वर्ष पर एक दिन इस कार्यक्रम को बड़े धूमधाम से मनाते है। और इस दिन महिलाएं धोती,कुर्ता, पगड़ी धारण कर तीर-धनुष, भाला जैसे पारंपरिक हथियार लेकर जंगलों में शिकार के लिए निकल पड़ती है। और शिकार के बाद गाँव में लौटने पर एक भव्य उत्सव,सामूहिक नृत्य और दावत का आयोजन किया जाता है। इस परंपरा को निभाते हुए घाटा गगेया गांव में लोहरदगा प्रखंड के हिरही के आदिवासी महिलाओं को बुला कर स्वागत करते हुए धूमधाम से जनी शिकार परंपरा को मना


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