रांची | क्या यह सिर्फ एक संयोग है?
या फिर महज इत्तेफाक से जुड़ी ऐसी घटनाएं हैं, जिनकी वजह से शिक्षा विभाग की चर्चा लगातार होती रही है?
हम किसी तरह के अंधविश्वास या अनहोनी का दावा नहीं कर रहे हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा विभाग से जुड़े तीन बड़े राजनीतिक चेहरों की मौत ने एक असामान्य संयोग जरूर पैदा कर दिया है।
कहानी की शुरुआत होती है जगन्नाथ महतो से।
हेमंत सोरेन सरकार के पहले कार्यकाल में जगन्नाथ महतो के पास शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी रही। कोरोना संक्रमण के बाद उनकी तबीयत गंभीर हुई। फेफड़ों में संक्रमण के चलते उनका इलाज और ट्रांसप्लांट तक हुआ।
लेकिन लंबी बीमारी के बाद अप्रैल 2023 में उनका निधन हो गया।
इसके बाद कुछ समय के लिए शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास रही।
फिर आया साल 2024।
हेमंत सोरेन सरकार की वापसी के बाद वरिष्ठ जेएमएम नेता रामदास सोरेन को शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी गई।
लेकिन इसके बाद एक बार फिर ऐसी घटना हुई जिसने सबको झकझोर दिया।
अगस्त 2025 में जमशेदपुर स्थित अपने आवास पर गिरने से रामदास सोरेन के सिर में गंभीर चोट लगी।
उन्हें बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जाया गया।
काफी इलाज के बावजूद उनकी हालत नहीं सुधरी और 15 अगस्त 2025 को दिल्ली में उनका निधन हो गया।
और अब इस कहानी में तीसरा नाम जुड़ गया है।
गिरिडीह के विधायक और झारखंड सरकार में मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू।
उन्हें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी मिली हुई थी।
लेकिन 6 सितंबर 2026 को उनके निधन की खबर सामने आई।
बताया जा रहा है कि कार्डियक अरेस्ट के बाद 56 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
यानी एक तरफ जगन्नाथ महतो—गंभीर बीमारी के बाद निधन।
दूसरी तरफ रामदास सोरेन—अचानक हुए हादसे के बाद गंभीर चोट और फिर निधन।
और अब तीसरा नाम—सुदिव्य कुमार सोनू, जिनके निधन की वजह कार्डियक अरेस्ट बताई जा रही है।
तीनों की परिस्थितियां अलग हैं।
तीनों की मौत की वजहें अलग हैं।
इसलिए इन घटनाओं को अंधविश्वास, रहस्य या किसी अनहोनी से जोड़ना उचित नहीं होगा।
लेकिन एक बात जरूर है—
एक मंत्री गया, दूसरा आया।
दूसरा गया, तीसरा आया।
और अब तीसरे का नाम भी इसी सिलसिले में जुड़ गया।
यही संयोग अब झारखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।
सोशल मीडिया पर सवाल उठ सकते हैं कि
“क्या शिक्षा विभाग की कुर्सी पनौती है?”
लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
इतना जरूर है कि शिक्षा विभाग से जुड़े इन तीन राजनीतिक चेहरों की कहानी झारखंड की राजनीति में एक बेहद असामान्य संयोग के रूप में याद की जाएगी।
हमारा मकसद किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि सामने आई घटनाओं को आपके सामने रखना है।
आप इस पूरे मामले को संयोग मानते हैं या सिर्फ इत्तेफाक?
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